क्या नेहरु “अय्याश” किस्म के व्यक्ति थे ?कैसे हुई थी उनकी मौत? जानें अफवाह और सच ?

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भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जीवन और व्यक्तित्व को लेकर सोशल मीडिया पर कई अफवाह हैं। उनके नाम को लेकर इंटरनेट पर कई लोग आपत्तिजनक बातें करते हैं। नेहरू के बारे में वर्चुअल वर्ड में अफवाहों की भरमार है। देश के पहले प्रधानमंत्री के बारे में कई अफवाहें हैं, जानें ऐसी ही कुछ अफवाहें…

जब तक स्कूल-कॉलेज में रहे, 14 नवंबर की तारीख कभी नहीं भूले. 5 सितंबर को टीचर्स डे मनता था. हम बच्चे खर्च करते थे उसमें. ये 14 नवंबर ‘थैंक्सगिविंग’ होता था. इसमें टीचर्स खर्च करते थे हम पर. ये तारीख, यानी चिल्ड्रन्स डे. जब सारे बच्चों को एकसाथ स्पेशल फील होता था. इस तारीख की बदौलत हमको बचपन में ही पता चल गया था कि एक भले से शख्स थे. जवाहरलाल नेहरू. भारत के पहले प्रधानमंत्री कौन, वाले सवाल का जवाब जानने से पहले ही हमें नेहरू का नाम पता चल गया था. ये स्टोरी नेहरू की इन प्यारी यादों के साथ शुरू हुई है. मगर आगे इसमें बहुत कड़वाहट है. लंपटई है. धूर्तता है. बदतमीजी है. नेहरू को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया पर खूब उंगलियां घिसी गई हैं. मगर उन सब झूठों पर इकट्ठे एक जमा बात नहीं करेंगे. इतने सालों की गंदगी को एक लेख में नहीं समेटा जा सकता. आज बस एक झूठ को पकड़ेंगे, जो उनकी मौत से जुड़ा है.

नेहरू से जुड़ी ऐसी अफवाहें फैलाई जाती हैं

– जवाहरलाल नेहरू के दादा का नाम गियासुद्दीन गाज़ी था। वह मुगलों के कोतवाल थे। उन्होंने अपना नाम बदलकर गंगाधर नेहरू रख लिया था।

– नेहरू का जन्म इलाहाबद के एक वेश्यालय में हुआ था।

– नेहरू ने एक ईसाई नन को गर्भवती कर दिया था। चर्च ने उस नन को भारत से बाहर भेज दिया और इसके लिए नेहरू उसके आभारी थे। उनकी मौत सिफिलिस नाम के एक संक्रामक रोग से हुई।

– अमिताभ बच्चन नेहरू के बेटे हैं।

और भी हैं कई अफवाह

इन सब के अलावा भी नेहरू के बारे में आपको इंटरनेट पर काफी कुछ आपत्तिजनक जानकारियां मिल जाएंगी। इन बातों का असलियत से कोई लेना-देना नहीं। आजाद भारत की बुनियाद रखने में नेहरू का कितना योगदान है, इसे बताने की जरूरत नहीं। इंटरनेट पर आपको उनके बारे में ऐसी कहानियां/ सस्ती अफवाहें मिल जाएंगी कि आप ताज्जुब में पड़ जाएंगे।

डिजिटल मीडिया स्कॉलर निशांत शाह कहते हैं, ‘इतिहास के मान्य और स्थापित तथ्यों से अलग कोई बात जब बताई जाती है, तो वह इंटरनेट पर काफी पढ़ी जाती है।’

नेहरू ने मारा था गांधी को
नेहरू के बारे में कई आपत्तिजनक और भ्रामक बातें दशकों से चलन में हैं। RSS के पूर्व सरसंघचालक के.एस. सुदर्शन ने दावा किया था कि नेहरू ने गांधी की हत्या की थी। सेंटा क्लारा यूनिवर्सिटी में मीडिया अध्ययन के प्रफेसर रोहित चोपड़ा ऑनलाइन हिंदुत्व पर भी काम करते हैं। उनका कहना है, ‘ऐसी बातों ने कभी मुख्यधारा में पकड़ नहीं बनाई, लेकिन अब चूंकि ऑनलाइन की सुविधा है, तो ऐसी अफवाहों को वहां जिंदगी मिल जाती है।’ वह आगे कहते हैं कि इंटरनेट पर मिल रही ये जानकारियां काफी दिक्कत पैदा करने वाली हैं क्योंकि काफी लोग ऐसे हैं जिनके लिए गूगल सर्च में सामने आई चीजें ही सच बन जाती हैं।

कट्टरपंथी हिंदुओं के निशाने पर हमेशा से थे नेहरू
कट्टरपंथी हिंदुओं के लिए नेहरू हमेशा से नफरत की चीज रहे हैं। मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा बताते हैं, ‘विभाजन के बाद और खासकर गांधी की हत्या के बाद, नेहरू इस बात को लेकर पुख्ता कोशिशें कर रहे थे कि भारत किसी भी हाल में हिंदू पाकिस्तान ना बने। उन्होंने RSS को एक खतरे के तौर पर देखा। उसके बहुसंख्यकवादी विचारों के कारण नेहरू ने सार्वजनिक रूप से संघ की बार-बार आलोचना की।’

नेहरू ना केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा सम्मान पाने वाले, सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक रहे…

ये न्यू यॉर्क टाइम्स है. अमेरिका का सबसे बड़ा अखबार. हमने आर्काइव्ज से खोजा है. नेहरू की मौत इसमें दूसरी लीड है. आप समझ सकते हैं, तो समझिए कि नेहरू की अहमियत क्या थी. 

‘नेहरू थे हिंदुस्तान के सबसे अय्याश आदमी’
यूट्यूब पर आपको नेहरू की छवि पर कीचड़ उछालने की कई कोशिशें दिख जाएंगी। एक विडियो में उन्हें ‘हिंदुस्तान का सबसे अय्याश आदमी’ ठहराया गया है और इसपर अभी तक लाखों व्यू आ चुके हैं। नेहरू को कहीं मुस्लिम बताया जाता है, कभी उन्हें पश्चिमी सभ्यता को मानने वाला बताकर खारिज किया जाता है।

नेहरू को ‘छिछोरा’ और ‘व्यभिचारी’ साबित करने की कोशिश
नेहरू के कई स्त्रियों से प्रेम संबंध थे, ऐसी बातें कहकर उनकी ‘दिलफेंक’ किस्म की छवि बनाने की कोशिश की जाती है। सोशल मीडिया पर अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी की पत्नी और मृणालिनी साराभाई के साथ उनकी सामान्य सी तस्वीरों का इस्तेमाल देश के प्रथम प्रधानमंत्री की छवि को धूमिल करने के लिए किया जाता है। अपनी बहन को हवाईअड्डे पर गले लगाते नेहरू की तस्वीर हो या फिर एक महिला के सिगरेट को जलाने में मदद करते नेहरू की तस्वीर, इनका इस्तेमाल कर उनकी प्रतिष्ठा को दागदार करने की कोशिश की जाती है।

इस तस्वीर में नेहरू तत्कालीन डेप्युटी ब्रिटिश हाई कमिश्नर की पत्नी का सिगरेट जला रहे हैं। इस तस्वीर का गलत इस्तेमाल कर उन्हें अय्याश साबित करने की कोशिश की जाती है…

नेहरू की छवि को दागदार बनाने की कोशिश

सेंटर फॉर इंटरनेट ऐंड सोसायटी के पॉलिसी डायरेक्टर प्रणेश प्रकाश ने पिछले साल केंद्र सरकार के एक IP अड्रेस से मोतीलाल नेहरू व जवाहरलाल नेहरू के विकीपीडिया पेज में गलत और आपत्तिजनक जानकारियां डालने की कोशिश की बात बताई। हाल ही में सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी सामग्रियों को ऑनलाइन करने के बाद एक फर्जी चिट्ठी को नेहरू द्वारा लिखी गई चिट्ठी कहकर प्रचारित किया गया। इस पत्र में नेहरू ने कथित तौर पर नेताजी को अपराधी कहा था।

नेहरू ‘चोर’
एक स्टार्टअप कर्मचारी ने हाल में नेहरू के खिलाफ चलाए जा रहे अफवाहबाजियों से निपटने के लिए नेहरूवियन नाम से ट्विटर अकाउंट बनाया। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा, ‘लखनऊ जाते हुए ट्रेन में मैं नेहरू की किताब ‘भारत एक खोज’ पढ़ रहा था। एक युवक ने मुझसे कहा कि ‘क्यों पढ़ रहे हो इस चोर की किताब?’

अलग-अलग औरतों के साथ सेक्स करने से नेहरू को हुई बीमारी!


नेहरू के खिलाफ इतना ज्यादा झूठ फैलाया गया है कि पूछिए मत. आप नेहरू के बारे में पढ़ने के लिए गूगल पर जाइए. आधी से ज्यादा चीजें फर्जी मिलेंगी. नेहरू अय्याश थे. लड़कीबाज थे. औरतखोर थे. पता नहीं क्या-क्या. इनमें से एक किस्सा नेहरू की मौत का भी है. कहते हैं कि नेहरू की मौत किसी सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिज़ीज़ (STD) से हुई. माने सेक्स करने के दौरान ट्रांसफर हुई बीमारी के कारण. मतलब, जिसके साथ सेक्स किया, उसकी बीमारी आपके अंदर आ गई.

कई वेबसाइट पर ऐसा लिख दिया गया है – नेहरू को अलग-अलग लड़कियों के साथ सेक्स करने का शौक था. वो बहुत सारी औरतों के साथ सोते थे. इसी वजह से उनको एक भयानक STD हो गया और वो मर गए. कुछ लोगों ने कोरा पर यहां तक लिख दिया है कि नेहरू की इस बीमारी के बारे में उनकी पत्नी ने अपनी डायरी में भी लिखा है. यूट्यूब पर आपको ऐसे वेरिफाइड चैनल मिल जाएंगे जो जिनमें यही सब कहा गया है. ऐसे एक वीडियो को जब हमने देखा, तब उसे 56 लाख से ज़्यादा बार देखा जा चुका था. यानी ये अफवाह खूब फैली है. लेकिन ये असलियत नहीं है.

हार्ट अटैक से हुई थी नेहरू की मौत

नेहरू की सेहत 1962 के बाद लगातार गिरी थी. उस साल चीन ने भारत पर हमला किया था. नेहरू इसे विश्वासघात मानते थे. ये भी कहा जाता है कि चीन के हाथों मिली जबरदस्त हार ने उन्हें काफी तोड़ दिया था. 1963 का साल नेहरू ने कश्मीर में बिताया, तबीयतपुर्सी के लिए. इसीलिए कुछ दिन उन्होंने देहरादून में भी बिताए. मई 1964 में वो देहरादून से दिल्ली लौटे. 26 मई की रात नेहरू जब सोए, तो उनकी तबीयत ठीक थी.

अगली सुबह 6.30 बजे नेहरू ने बाथरूम से लौट कर पीठ में दर्द की शिकायत की. डॉक्टर बुलाए गए. उन्होंने नेहरू से बात भी की. लेकिन तभी नेहरू बेहोश हो गए. बेहोशी की हालत में ही उन्होंने प्राण त्याग दिए. लोकसभा 27 मई, 1964 के दोपहर 2 बजे ऐलान किया गया कि 74 साल के नेहरू नहीं रहे. कारण बताया गया हार्ट अटैक. 74 साल की उम्र में चल बसे नेहरू. दुनिया का कोई ऐसा बड़ा अखबार नहीं था, जिसने नेहरू की मौत को रिपोर्ट न किया हो. लेकिन किसी भी अखबार में हम डॉक्टरों का ये बयान नहीं पाते कि मौत का कारण सिफलिस या कोई और STD थी.

रही बात पत्नी की डायरी की, तो सामान्य ज्ञान की सस्ती किताब तक पढ़ने वाले तक जानते हैं कि कमला नेहरू का देहांत नेहरू की मौत से दशकों पहले हो गया था. तो नेहरू की मौत को लेकर जो कहानी गढ़ी गई है, वो बिल्कुल झूठी है. मनगढ़ंत. बेबुनियाद. सौ पैसा गलत. किसी बेहद सड़े दिमाग की घटिया उपज. गंदे दिमाग से निकली गंदगी. कितने फालतू लोग होंगे, जिन्होंने ये झूठ गढ़ा होगा (एक नाम हम जानते हैं, राजीव दीक्षित).

नेहरू की मौत के दिन आधी दुनिया मान बैठी थी कि भारत अब टूट जाएगा. कई टुकड़ों में बिखर जाएगा. जब भारत आजाद हुआ था, तब इसके भविष्य पर लोगों को शुबहा था. उन्हें लगता था कि भारत का कुछ नहीं हो सकता था. बाकी आधी दुनिया बस नेहरू का मुंह देखकर इत्मीनान कर रही थी. उन्हें लगता था कि नेहरू सब संभाल लेंगे. उस वक्त हिंदुस्तान में नेहरू के सिवा कोई और शख्स नहीं था, जिसकी काबिलियत पर दुनिया को इतना यकीन हो. नेहरू का नाम भरोसे का दूसरा नाम था. तो जब वो नहीं रहे, तब दुनिया को भारत से भी कोई उम्मीद नहीं रही.

वो नेहरू ही थे, जिनके कारण दुनिया को भारत पर भरोसा हुआ था


जवाहर लाल नेहरू आजाद भारत का सबसे भरोसेमंद चेहरा थे. ऐसा शख्स जिस पर बस हिंदुस्तानियों को नहीं, बल्कि दुनिया को यकीन था. उन्हें गुजरे हुए 53 साल हो चुके हैं. मगर आज भी भारत नेहरू जैसी किसी और शख्सियत से रूबरू नहीं हो पाया है. ये वो चेहरा था, जिसके भरोसे दुनिया को भारत पर दांव खेलने को राजी हुई.

नेहरू की मौत के बारे में पढ़ते हुए अक्सर एक और इंसान की मौत का ख्याल आता है. अकबर. जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर. मुगल बादशाह. 27 अक्टूबर, 1605. अकबर की मौत का दिन. जो लोग उस दौर का अपना लिखा पीछे छोड़ गए हैं, उन्हें पढ़कर लगता है, दुनिया रुक गई थी. उस दौर के लोगों को ऐसा लगा था कि जैसे अब सब खत्म हो गया है. ऐसा ही नेहरू की मौत के बाद भी हुआ. किसी की मौत से मुल्क इतना नाउम्मीद हो जाए, ये बस नेहरू और अकबर के मामले में ही देखा. माने, पढ़ा. नेहरू के जीते-जी उनका कद बहुत बड़ा था. अब भी है. उस ऊंचाई को छू सके, ऐसा कोई नेता हम आजतक पैदा नहीं कर पाए हैं. शायद इसीलिए नेहरू को बदनाम करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई. कहते हैं न कि किसी लकीर से लंबी लकीर खींचने की कुव्वत न हो, तो कई लोग पहली लकीर को ही मिटाने में जुट जाते हैं. ऐसा ही नेहरू की विरासत के साथ भी हुआ है.

मुश्किल होगा नेहरू को दरकिनार कर पाना


नेहरू को दरकिनार कर पाना बहुत मुश्किल काम है। उनके जाने के 52 साल बाद आज भी उनके नाम और उनकी विरासत को लेकर इतनी घबराहट है। इसके पीछे नेहरू का कद ही तो है। इस कद को अफवाहों के बाजार से छोटा कर पाना मुमकिन नहीं दिखता।

 

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