यहां एक साल में 19 बच्चों ने की आत्महत्या, जिम्मेदार कौन-कोचिंग, माता-पिता या फिर…?

0
34

पांच दिन में तीन होनहार बच्चों की आत्महत्या किसी को भी झकझोर सकती है. वे बड़े ख्वाब लेकर परीक्षा तैयारी करने गए थे लेकिन मौत को गले लगा लिया. ये कोटा शहर की कहानी है…जनवरी 2019 के पहले सप्ताह में ही जेईई मेन्स 2019 की परीक्षा है. क्या बच्चों ने इसके दबाव में आत्महत्या की?  कोटा में जनवरी से अब तक कोचिंग संस्थानों में तैयारी कर रहे 19 छात्र-छात्राएं आत्महत्या कर चुके हैं.

यहां आईआईटी-जेईई की तैयारी कर रहे 17 वर्षीय जितेश गुप्ता नाम के छात्र का शव उसके हॉस्टल के कमरे में मिला. उसने फांसी लगा ली. वो बिहार के सिवान जिले का रहने वाला था. रविवार को एनईईटी अभ्यर्थी 17 वर्षीय दीक्षा सिंह ने आत्महत्या कर ली थी. वो यूपी के कुशीनगर जिले की रहने वाली थी. उससे एक दिन पहले ही आईआईटी की तैयारी कर रहे 16 साल के दीपक दधीच (बूंदी जिला निवासी) का शव कमरे में लटकता मिला था.

साल 2014 में बड़ी संख्या में हुई आत्महत्याओं के बाद हाईकोर्ट और जिला प्रशासन ने कोचिंग संस्थान, हॉस्टल, पीजी और मेस के लिए कई तरह की गाइडलाइंस जारी की थीं. लेकिन इसका सिलसिला रुका नहीं. ऐसे में सवाल ये उठता है कि कोटा का कातिल कौन है?  कोचिंग, माता-पिता या फिर प्यार!

कोटा के आम लोग, मकान मालिक और कोचिंग संस्थान आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह पढ़ाई का दबाव या फिर माता-पिता का प्रेशर नहीं बल्कि स्टूडेंट्स का किसी ‘गलत काम’ में पड़ जाना मानते हैं. ज्यादातर मामलों में ये ‘गलत काम’ लड़के-लड़कियों का साथ घूमना या किसी लव अफेयर में होना होता है. हालांकि दो मामले छोड़ दें तो किसी में भी रिलेशनशिप के आत्महत्या की वजह होने का मामला सीधे तौर पर सामने नहीं आया है लेकिन इन दो मामलों की आड़ में ये शहर अपनी ज़िम्मेदारी से बचता हुआ नज़र आता है.

कोटा में कोचिंग का ऐसा कोटा

इधर कोचिंग वाले परफॉरर्मेंस के आधार पर बैच बना देते हैं. बच्चों से बात करने पर पता चलता है कि सबसे ज़्यादा नंबर लाने वाले बैच कम बच्चों के होते हैं और उन्हें संस्थान-फैकल्टी पूरी सुविधाएं मुहैया कराते हैं. इन बच्चों को संस्थान हॉस्टल मुहैया कराते हैं, फैकल्टीज इनके लिए हमेशा उपलब्ध रहती है और इन्हें अलग से क्लासेज भी दी जाती हैं.

इसके बाद एवरेज बच्चों का बैच होता है जो कि 50 से 100 स्टूडेंट्स का होता है, सबसे कम नंबर वाले बच्चों का बैच 200 स्टूडेंट्स का भी होता है और यही वो बड़ी संख्या है जो धीरे-धीरे दबाव का शिकार होती जाती है.

ऐसे बढ़ता है डिप्रेशन 

आईआईटी की तैयारी कर रहा बिहार का पवन कुमार बताता है कि यहां आने वाले ज़्यादातर बच्चे अपने-अपने स्कूलों या इलाकों के टॉपर्स होते हैं लेकिन यहां उन्हें बेहद कड़े कंपीटिशन का सामना करना होता है. कभी कभी यहां टॉपर और 10वें नंबर के बच्चे के बीच सिर्फ 10 मार्क्स का ही फासला होता है. ऐसा बच्चा खुद को टॉपर समझकर आता है लेकिन जब उसे सेकेंड या थर्ड बैच में भेज देते हैं तो वो डिप्रेशन का शिकार हो जाता है.

कोचिंग में भी वो हीनभावना से घिर जाता है और घरवालों को लगता है वो पढ़ाई नहीं कर रहा जबकि असल समस्या यहां मौजूद बेहद टफ कंपीटिशन है. उतनी सीट्स ही नहीं हैं आईआईटी-मेडिकल में की सबका एडमिशन हो जाए लेकिन जिसका नहीं होता वो इसका ब्लेम खुद को देने लगता है.
साल 2015 में टाटा इंस्टीटयूट ऑफ़ सोशल साइंसेज (TISS) की प्रोफ़ेसर सुजाता श्रीराम की अध्यक्षता में एक फैक्ट फाइंडिंग टीम बनाई जो इन आत्महत्याओं के पीछे की वजहों का पता लगा सके. इस टीम में चेतना दुग्गल, निखार राणावत और राजश्री फारिया भी शामिल थीं. इस रिपोर्ट में जो सबसे बड़ी दो वजहें सामने आईं है वो मां-बाप की तरफ से मिलने वाले इमोशनल प्रेशर और बेहद दबाव भरी कोचिंग प्रैक्टिस हैं. इसके आलावा रहने-खाने से जुड़ी दिक्कतें और दबाव के चलते पनपे डिप्रेशन और ड्रग एडिक्शन को भी शामिल किया गया है.

कोचिंग का बिजनेस और टॉपर 

असल में कोचिंग का पूरा बिजनेस ही उन होर्डिंग्स और विज्ञापन के जरिये काम करता है जिस पर टॉप किए गए बच्चों की तस्वीरें मौजूद होती हैं. कोटा ऐसे होर्डिंग्स से भरा पड़ा है, यहां के अख़बारों में रोज़ ऐसे टीचर्स के विज्ञापन छपते हैं जिन्होंने फलां कोचिंग के इतने बच्चों को पीएमटी या इंजीनियरिंग में टॉप करवा दिया. इन्हें देखकर ही बच्चे और उनके माता-पिता कोचिंग संस्थान चुनते हैं. ये कोचिंग संस्थान भी जानते हैं और इसलिए टॉप कर सकने वाले संभावित बच्चों को सुविधाएं मुहैया कराने में कोई कसर नहीं रखी जाती. क्यों कि आखिर में ये चेहरे ही उन्हें अगले साल का बिजनेस देने वाले हैं.

रिलेशनशिप और अट्रेक्शन

कोटा उन चुनिंदा छोटे शहरों में से है जहां आपको सड़कों, मॉल्स और चाय की दुकानों पर लड़के-लड़कियां हाथों में हाथ डालकर आराम से घूमते-फिरते नज़र आ जाएंगे. बीते दिनों कोटा पर Tiss की रिपोर्ट का हवाला देते हुए देश के एक बड़े अंग्रेजी अख़बार ने आत्महत्याओं के पीछे ‘सेक्स’ का एंगल भी शामिल किया था. रिपोर्ट तैयार करने वालीं प्रोफ़ेसर सुजाता श्रीराम से बात करने पर पता चलता है कि असल रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं है और उन्होंने उसकी जो एक्जीक्यूटिव समरी हमें भेजी उसमें भी इसका कोई ज़िक्र नहीं है. हालांकि, कई आत्महत्याओं में रिलेशनशिप का एंगल ज़रूर देखने को मिलता है.

कोटा में आईआईटी की तैयारी कर रहे पुणे के रहने वाले 17 साल के दर्शन मकरंद लोखंडे भी अपने एक दोस्त की कहानी सुनाते हैं. दर्शन बताते हैं कि उनका एक दोस्त है जिसकी इंटरनेट के ज़रिए एक गर्लफ्रेंड बन गई. इसके बाद लगातार वो उससे चैट करता रहा और इसी वजह से टेस्ट में कम मार्क्स आने लगे. ये बात घर पर पहुंची तो वहां से भी प्रेशर बढ़ने लगा और एग्जाम भी नज़दीक आ गए. उसने जब लड़की से बात कम करना शुरू किया तो उसने भी प्रेशर डालना शुरू कर दिया. उसका डिप्रेशन बढ़ता देख कोचिंग वालों ने मां-बाप को फोन कर बुलाया. बाद में उसे घर वापस जाना पड़ा.

स्टूडेंट्स के रिलेशनशिप, ब्रेकअप की ऐसी हज़ारों कहानियां यहां बिखरी पड़ी हैं, हर स्टूडेंट आपको ऐसी कई कहानियां सुना सकता है. जवाहरनगर वो थाना है जहां सबसे ज्यादा सुइसाइड केस दर्ज होते हैं. यहां का एक सिपाही जो बीते सालों में कई बार सुइसाइड से जुड़े घटनास्थलों पर गया है नाम न लेने की शर्त पर बताता है- रिलेशनशिप एंगल भी बड़ी वजह है. इस उम्र के बच्चे घर, पढ़ाई और रिलेशनशिप के इस प्रेशर को झेल नहीं पाते. ज़्यादातर मामलों में कोचिंग वालों को ही ज़िम्मेदार कह देते हैं लेकिन डिप्रेशन की वजह सिर्फ पढ़ाई नहीं होती.  सिपाही आगे कहता है- ऐसा भी ज़रूरी नहीं कि स्टूडेंट कोटा आकर ही इन चक्करों में पड़ा हो…आजकल स्कूलों में ही ये सब शुरू हो जाता है, इसके बाद इस कलयुग में क्या-क्या होता है ये तो आप भी जानते ही हैं…

ड्रग्स और नशा

कोटा आत्महत्याओं पर Tiss की रिपोर्ट में भी नशे की लत का ज़िक्र किया गया है. इसी 4 जनवरी को अपने कमरे से लापता हो गए बिहार के रहने वाले अनुराग भारती की कहानी डिप्रेशन और ड्रग्स से जुड़ी है. आत्महत्या के बाद जब पुलिस ने कमरे की तलाशी ली थी तो वहां से नशा करने से जुड़ा सामान बरामद हुआ. नारकोटिक्स कमिश्नर सही राम मीणा भी कोटा के स्टूडेंट्स के बीच ड्रग्स पॉपुलर होने की बात की तस्दीक करते हैं.

मीणा के मुताबिक ये इलाका ही अफीम की खेती का है और आत्महत्याओं के चलते ये नशे का अवैध व्यापार करने वालों के निशाने पर आ गई है. खुद मीणा इस बात को मानते हैं कि कोटा शहर में ड्रग्स काफी आसानी से उपलब्ध है और बच्चे इसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं. कई आत्महत्याओं की छानबीन में सामने आया भी है कि डिप्रेशन और टेंशन से जूझने के लिए बच्चे शराब और ड्रग्स लेने लगे जिससे उनके रिजल्ट्स और ख़राब हो गए और आखिर में इसका नतीजा ऐसी घटनाओं के रूप में सामने आया.

इसे ऐसे भी समझा जाए….

आत्महत्या किसी भी समाज की साझी विफलता होती है, ये आत्महत्या करने वाले के सारे करीबी लोगों की नाकामी भी है. कोटा में हो रही आत्महत्याओं के लिए सिर्फ कोचिंग इंस्टीटयूट्स को जिम्मेदार ठहरा देना भी घटना का सामान्यीकरण जैसा भी नज़र आता है. कोटा एक ऐसा शहर है जहां 13 से 16 साल की उम्र में बच्चा ‘परचेजिंग पावर’ से लैस एक कस्टमर की तरह दाखिल हो रहा है और ये बाज़ार उसकी जेब की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देखता है.

LEAVE A REPLY