मुंबई ब्रिज हादसा: फोन कॉल ने बचाई जान, चश्मदीदों ने सुनाई ‘दूसरे जन्म’ की कहानी

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मुंबई के सबसे व्यस्त स्टेशन छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस और टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग को जोड़ने वाले फुटओवर ब्रिज का एक हिस्सा गिर गया। हादसे में 6 लोगों की मौत हो गई और 34 घायल हो गए। यह पुल ऐसे वक्त पर गिरा जब बड़ी संख्या में लोग सीएसएमटी स्टेशन से होकर अपने-अपने घरों को जाते हैं। पुल के ऊपर और नीचे भारी भीड़ होती है। ऐसे में इस भयानक हादसे में जो लोग बाल-बाल बच गए, उनके लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। किसी को सिग्नल ने पहले ही रोक लिया तो कोई फोन अटेंड करने के लिए ठहर गया। अब उस मंजर को याद कर इन चश्मदीदों का दिल बैठ जाता है… 
पुल से लटककर बची जान 
उल्हासनगर के रहने वाले राजेंद्र गुप्ता के बस दो कदम आगे थी मौत। पुल का हिस्सा आंखों के सामने गिरता देख वह रुक गए। पुल के बचे हुए हिस्से से लटक कर अपनी जान बचाने में कामयाब रहे। राजेंद्र को पुल से लटकता देख पीछे खड़े दो लोगों ने हाथ बढ़ा राजेंद्र को बचाया। राजेंद्र के अनुसार, रोजाना की तरह वह 7.42 की कर्जत लोकल पकड़ने के लिए सीएसटी स्टेशन की तरफ जा रहे थे। अचानक उनकी नजर के सामने पुल का स्लैब गिर पड़ा। राजेंद्र ने कहा कि भगवान ने उनके बढ़ते कदमों को रोक दिया, वरना आज वह जीवित नहीं होते। 


एक फोन कॉल ने रोके कदम 
हमारे सहयोगी अखबार मुंबई मिरर में काम करने वाली लता मिश्रा की जान एक फोन कॉल ने बचा ली। वह उस फुटओवर ब्रिज से केवल 20 मिनट की दूरी पर एक फोन कॉल अटेंड करने के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग में स्थित ऑफिस के बाहर ही रुक गईं। लता याद करती हैं कि सब कुछ अपनी आंखों के सामने होता देखने के बावजूद उन्हें समझने में कुछ वक्त लग गया कि हो क्या रहा था। उन्होंने अपनी आंखों के सामने किसी शव को मलबे से बाहर निकाले जाते हुए देखा। बदहवास लोग घायलों को टैक्सी और गाड़ियों में अस्पताल ले जा रहे थे। 

उन्होंने बताया कि इस तरह के हादसों में पहले भी राहगीर और आसपास काम करने वाले लोग सबसे ज्यादा मददगार साबित होते हैं। हादसे के फौरन बाद वे लोगों को मलबे से निकालने और अस्पताल पहुंचाने में लग जाते हैं। वे पीड़ितों को ढाढ़स बंधाते हैं और शांत करने की कोशिश भी करते हैं। 

कंपन देख पीछे खींचे कदम
गुरुवार को जब ब्रिज हादसा हुआ, उस वक्त नवभारत टाइम्स के प्रमुख संवाददाता मनीष झा ब्रिज पर कदम रखने वाले ही थे लेकिन उन्होंने ब्रिज में कंपन होता देख अपने कदम पीछे खींच लिए। उन्होंने पलटकर देखा कि अचानक धड़ाम की आवाज के साथ ब्रिज गिर गया। उस दौरान ब्रिज के नीचे ट्रैफिक था लेकिन ब्रिज पर काफी लोग थे। अचानक चीखने-चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। 
उन्होंने बताया, ‘स्थानीय लोग मलबे के बड़े-बड़े टुकड़े उठा रहे थे, जिसके नीचे कुछ लोग बुरी तरह फंसे थे। खून से लथपथ और बेहोश लोग। मैंने एक बेसुध नौजवान को किसी अनजान से पानी लेकर पिलाया। कुछ लोगों की मदद से तीन-चार लोगों को मलबे से बाहर निकाला और सड़क किनारे रखा। तुरंत मुख्य नियंत्रण कक्ष को कॉल किया। नंबर बिजी था, लेकिन कॉल लग गया। पुलिस को जानकारी दी। कुछ ही देर में मौके पर पुलिस की गश्ती वाहन आए और करीब एक दर्जन पुलिसकर्मी पहुंचे। यह महज संयोग ही है कि मैं एक मिनट पहले ब्रिज पर आकर और दो कदम आगे बढ़ता, तो शायद इस भयंकर हादसे का शिकार बन गया होता।’ 

ब्रिज पर चढ़े ही थे कि….
काम से घर लौट रहे रूपेश ब्रिज पर चढ़े ही थे और दो कदम दूर थे, तभी ब्रिज एक बड़ा हिस्सा ढह गया। मौत के सामने से गुजर जाने के बाद आंखों देखी कहानी बयां करते वक्त उनका गला भर उठा। पहला शब्द यही था कि दो कदम दूरी की वजह से जीवन बच गया। हादसे के चश्मदीद रूपेश ने बताया कि वह सी.पी. टैंक में नौकरी करते हैं। 10 साल से ब्रिज का उपयोग कर रहे हैं। हादसे की वजह से उन्हें उल्टे पैर लौटना पड़ा। कुछ देर तक दिमाग शून्य हो गया था। उसके बाद घर पर परिजन और मित्रों को फोन से हादसे और मौत से सामना होने की जानकारी दी। 
हाथ में चाय थी, तभी तेज आवाज आई, ब्रिज ढह गया 
ब्रिज के नीचे स्नेक्स कॉर्नर है। उसमें काम करने वाले पूरन ने बताया कि दुकान पर कई ग्राहक थे। वह चाय दे रहे थे, तभी तेज आवाज के साथ ब्रिज धड़ाम की आवाज से गिर गया। पहले समझ में नहीं आया, लेकिन जब दौड़कर वहां गए, तो ब्रिज का बड़ा हिस्सा गिरा पाया। इस ब्रिज पर कई फेरीवाले भी बैठते हैं। पूरन ने बताया कि उनमें से सिर्फ केला बेचने वाला एक व्यक्ति दिखा। जब ब्रिज गिरा, तब वह धंधा कर रहा था, इसलिए वह भी ब्रिज के साथ नीचे गिर गया, लेकिन वह सही सलामत है। 

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